भगवान श्री कृष्ण का मंत्र

भगवान श्री कृष्ण का मंत्र

 वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

कंस और चाणूर का वध करनेवाले, देवकी के आनन्दवर्द्धन, वसुदेवनन्दन जगद्गुरु श्रीक़ृष्ण चन्द्र की मैं वन्दना करता हूँ ।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

यह मंत्र भगवान विष्णु और श्री कृष्ण का मंत्र है।

ओम नामे भगवते वासुदेवया यह एक प्रसिद्ध हिन्दू मंत्र है। यह मंत्र भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण दोनों का मंत्र है। इसमें दो परंपराएं हैं-तांत्रिक और पुराणिक। तांत्रिक पंरपराये में ऋषि प्रजापति आते है और पुराणिक पंरपरा में ऋषि नारदा जी आते है। हालांकि, दोनों कहते हैं कि यह सर्वोच्च विष्णु मंत्र है। शारदा तिलक तन्त्रम कहते है कि ‘देवदर्शन महामंत्र् प्राधन वैष्णवगाम’ बारह वैष्णव मंत्रों में यह मत्रं प्रमुख हैं। इसी प्रकार ‘श्रीमद् भगवतम्’ के 12 अध्याय को इस मंत्र के 12 अक्षर के विस्तार के रूप में लिए गए है। इस मंत्र को मुक्ति का मंत्र कहा जाता है और मोक्ष प्राप्त करने के लिए एक आध्यात्मिक सूत्र के रूप में माना जाता है। यह मंत्र ‘श्रीमद् भगवतम्’ का प्रमुख मंत्र है इस मंत्र का वर्णन विष्णु पुराण में भी मिलता है।


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः


मंत्र का अर्थ:

ओम - ओम यह ब्रंह्माडीय व लौकीक ध्वनि है।

नमो - अभिवादन व नमस्कार।

भगवते - शक्तिशाली, दयालु व जो दिव्य है।

वासुदेवयः - वासु का अर्थ हैः सभी प्राणियों में जीवन और देवयः का अर्थ हैः ईश्वर। इसका मतलब है कि भगवान (जीवन/प्रकाश) जो सभी प्राणियों का जीवन है।


वासुदेव भगवान! अर्थात् जो वासुदेव भगवान नर में से नारायण बने, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ। जब नारायण हो जाते हैं, तब वासुदेव कहलाते हैं।

आदि शंकराचार्य द्वारा लिखित "भज गोविंदम"

भज गोविंदम भज गोविंदम
गोविंदम भज मूढ़-मते |
संप्राप्ते सन्निहिते काले
नहि न रक्षति शुक्रकारणे ||


ॐ श्री कृष्णः शरणम् ममः

ॐ श्री कृष्णः शरणम् ममः


ॐ श्याम वासुदेवाय नमः


ॐ श्याम वासुदेवाय नमः

ॐ श्रीं नम: श्रीकृष्णाय मधुरतमाय स्वाहा," भगवान कृष्ण की दिव्य उपस्थिति और प्रचुरता का एक शक्तिशाली आह्वान है। 
"ॐ श्रीं नम: श्रीकृष्णाय स्तुत्यमय स्वाहा" 
ॐ श्रीं नम: श्रीकृष्ण परिपूर्णतमाय स्वाहा 
ॐ क्लीं कृष्णाय गोविंदाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा


ये छंद भगवान कृष्ण की प्रशंसा में हैं, विशेषकर उनके दिव्य रूप और उनके जन्म के दृश्य की।

ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।।

शङ्खचक्रगदापद्मं धारयन्तं जनार्दनम् ।
अङ्के शयानं देवक्याः सूतिकामन्दिरे शुभे ।।
एवं रूपं सदा कृष्ण सुतार्थं भावयेत् सुधीः ।।

शङ्खचक्रगदापद्मं दधानं सूतिकागृहे ।
अङ्के शयानं देवक्याः कृष्णं वन्दे विमुक्तये ।।

॥ देवकी सूत गोविंद वासुदेव जगतपते देहिमे तनय कृष्ण त्वाहम शरणगते ॥





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