Tuesday, January 20, 2026

Bhagavad-gītā and Artificial Intelligence: क्या गीता हमें AI नैतिकता सिखा सकती है?

Bhagavad-gītā and Artificial Intelligence: क्या गीता हमें AI नैतिकता सिखा सकती है?

Bhagavad-gītā एक प्राचीन आध्यात्मिक ग्रंथ है, लेकिन इसकी शिक्षाएँ आज के Artificial Intelligence (AI) युग में भी आश्चर्यजनक रूप से प्रासंगिक दिखाई देती हैं।[1][2] गीता प्रत्यक्ष रूप से कंप्यूटर या अल्गोरिद्म की बात नहीं करती, पर मानव बुद्धि, निर्णय और नैतिकता पर उसका गहरा विश्लेषण AI नैतिकता के लिए एक मजबूत दार्शनिक आधार दे सकता है।[3][4]

क्या गीता में “hidden AI” है?

  • ऐतिहासिक रूप से Bhagavad-gītā में कहीं भी आधुनिक अर्थों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन, या प्रोग्रामिंग का उल्लेख नहीं मिलता; यह एक दार्शनिक व आध्यात्मिक संवाद है।[3]
  • इसलिए तकनीकी अर्थ में “hidden AI code” गीता में नहीं है, लेकिन निर्णय, ज़िम्मेदारी, परिणाम और नैतिकता के सिद्धांत हैं, जिन्हें आज के AI संदर्भ में पुनर्पाठ किया जा सकता है।[3][5]

गीता का मूल फ़ोकस: चेतना, न कि मशीन

  • गीता का केंद्रबिंदु यह है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप आत्मा (conscious self) है, जो शरीर, मन और बुद्धि से भिन्न है; चेतना को मूल मानकर ही पूरा दर्शन रचा गया है।[3]
  • AI सिस्टम्स उन्नत “information processing” कर सकते हैं, पर गीता की दृष्टि से उनमें स्वानुभूति (self-awareness) और आत्मबोध नहीं होता; यही अंतर मानव चेतना और मशीन इंटेलिजेंस के बीच बुनियादी रेखा खींचता है।[4][6]

धर्म और कर्म: AI विकास के लिए नैतिक ढांचा

  • Bhagavad-gītā धर्म को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जिम्मेदार और न्यायपूर्ण आचरण के रूप में परिभाषित करती है; यह दृष्टि AI डेवलपर्स और नीति-निर्माताओं के लिए “duty-based ethics” का मॉडल दे सकती है।[1][2][7]
  • कर्मयोग की शिक्षा—कर्तव्य करते समय परिणाम के प्रति अति-आसक्ति छोड़ना, पर परिणाम की जिम्मेदारी से भागना नहीं—AI प्रणालियों के डिज़ाइन और तैनाती में accountability और humility की भावना मजबूत कर सकती है।[1][7]

AI एक साधन, अंतिम प्रामाणिकता नहीं

  • गीता में बुद्धि (intellect) को साधन माना गया है, न कि परम सत्य; उसी तरह AI भी एक सशक्त उपकरण है, लेकिन न्याय, करुणा और विवेक जैसे निर्णय अंततः मनुष्य के हाथ में रहने चाहिए।[4][5]
  • कुछ समकालीन व्याख्याकार सुझाव देते हैं कि AI को “सारथी” की तरह सहायक मानें, पर “कृष्ण” की तरह अंतिम मार्गदर्शक नहीं; अंतिम नैतिक दिशा मनुष्य के अंतरात्मा और विवेक से ही आनी चाहिए।[4][6]

Bhagavad-gītā से प्रेरित AI नैतिकता के कुछ सिद्धांत

  • अहिंसा और करुणा: AI का उपयोग ऐसे उद्देश्यों के लिए न हो, जो व्यापक हिंसा, भेदभाव या दमन को बढ़ाएँ।[1][7]
  • न्याय और समदृष्टि: गीता की “समत्व” की शिक्षा एल्गोरिद्मिक बायस, भेदभावपूर्ण निर्णय और असमान उपयोग से बचने की ओर इशारा करती है।[2][5]
  • जिम्मेदारी (कर्मफल-बोध): AI के निर्णयों के परिणामों की जिम्मेदारी मनुष्य संस्थाओं—डेवलपर्स, कंपनियों और सरकारों—पर ही रहती है; ये जिम्मेदारी किसी “मशीन” पर नहीं डाली जा सकती।[1][4][7]

गीता और AI पर आधुनिक शोध

  • कई शोध-पत्र गीता के धर्म, कर्मयोग और आत्मनियंत्रण को AI ethics के लिए normative framework के रूप में पढ़ते हैं, और दिखाते हैं कि यह टेक्नोलॉजी को “मानव कल्याण” केंद्रित बनाने में मदद कर सकता है।[1][2][7]
  • कुछ अध्ययन स्वयं Bhagavad-gītā पर मशीन लर्निंग और भाषा-मॉडल्स लागू करके उसके themes और रूपकों का विश्लेषण भी कर रहे हैं—यानी गीता अब AI का विषय बन रही है, न कि AI गीता के भीतर छुपा है।[5][8]

Short note (English)

  • While the Bhagavad-gītā predates digital technology by millennia, its emphasis on dharma, karma, and self-knowledge offers a robust ethical framework for the development and deployment of contemporary AI systems.[1][4][7]

References

  • [1] “AI Ethics Through the Lens of the Bhagavad Gita.” academic article, accessed 18 Jan. 2026.
  • [2] “Critical and Ethical AI Use Through Bhagavad Gita Principles.” BG & AI series, accessed 18 Jan. 2026.
  • [3] “Bhagavad Gītā.” Internet Encyclopedia of Philosophy, accessed 18 Jan. 2026.
  • [4] “What the ‘Bhagavad Gita’ can teach us about AI and morality.” analysis article, accessed 18 Jan. 2026.
  • [5] “AI, philosophy and religion: what machine learning can tell us about the Bhagavad Gita.” research feature, accessed 18 Jan. 2026.
  • [6] “What is the Bhagavad-gita perspective on ChatGPT?” contemporary spiritual reflection, accessed 18 Jan. 2026.
  • [7] “The Ethical Framework of Bhagavad Gita and Artificial Intelligence.” ethics paper, accessed 18 Jan. 2026.
  • [8] “Large Language Models for Metaphor Detection: Bhagavad Gita Case Study.” technical paper, accessed 18 Jan. 2026.

Monday, January 19, 2026

Bhagavad-gītā के पाँच मुख्य विषय

Bhagavad-gītā के पाँच मुख्य विषय: ईश्वर, जीव, प्रकृति, काल और कर्म

Bhagavad-gītā को समझने के लिए उसके पाँच मुख्य विषयों—ईश्वर (Īśvara), जीव (Jīva), प्रकृति (Prakṛti), काल (Kāla) और कर्म (Karma)—को स्पष्ट रूप से समझना बहुत आवश्यक है।[1][2] ये पाँचों मिलकर यह बताते हैं कि इस जगत की व्यवस्था कैसे संचालित होती है और साधक के लिए मुक्ति का मार्ग कहाँ से शुरू होता है।[1][3]

संक्षिप्त रूपरेखा: पाँच विषय क्यों महत्वपूर्ण हैं?

  • कई पारंपरिक आचार्य गीता के दार्शनिक पाठ को इन्हीं पाँच विषयों की रोशनी में व्यवस्थित करते हैं: Īśvara, Jīva, Prakṛti, Kāla और Karma।[1]
  • इनके माध्यम से गीता यह स्पष्ट करती है कि कौन सर्वशक्तिमान है, कौन सीमित है, क्या बदलने योग्य है और कौन-सी सत्ता नित्य और अपरिवर्तनशील है।[2][3]

1. ईश्वर (Īśvara): सर्वोच्च नियंता

  • Bhagavad-gītā में भगवान कृष्ण स्वयं को परमेश्वर, समस्त जगत के कारण और नियंता के रूप में प्रकट करते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त हैं, फिर भी अपनी दिव्य स्थिति में स्थित रहते हैं।[2][3]
  • वे बताते हैं कि वे धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए युग-युग में अवतार लेते हैं, और सभी जीवों के कर्मों का फल भी अंततः वही प्रदान करते हैं।[2]

2. जीव (Jīva): सीमित किन्तु नित्य आत्मा

  • जीव को नित्य, अविनाशी आत्मा कहा गया है, जो जन्म और मृत्यु से परे है, परन्तु अज्ञान के कारण स्वयं को शरीर के साथ तादात्म्य कर लेता है।[2][3]
  • जीव ईश्वर का अंश होते हुए भी सीमित ज्ञान और शक्ति वाला है; अपने कर्मों के परिणामस्वरूप वह जन्म-मरण के चक्र में बँधा रहता है और सही ज्ञान, भक्ति और योग-साधना से इस बंधन से मुक्त हो सकता है।[3]

3. प्रकृति (Prakṛti): गुणों से संचालित जगत

  • प्रकृति वह भौतिक ऊर्जा या द्रव्य-तत्त्व है, जिससे यह समस्त दृश्य जगत बना है; यह तीन गुणों—सत्त्व, रजस् और तमस्—के माध्यम से कार्य करती है।[2][4]
  • गीता के अनुसार प्रकृति स्वयं जड़ (अचेतन) है और ईश्वर के अधीन है; जब जीव गुणों में आसक्त हो जाता है तो वह संसार-बन्धन में और गहराई तक फँस जाता है।[3][4]

4. काल (Kāla): परिवर्तन की अपरिहार्य शक्ति

  • काल को सर्वभक्षी और सबको अपने में समाने वाली शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है; गीता के एक प्रसिद्ध दृश्य में भगवान स्वयं को “काल” रूप में प्रकट करते हैं जो समस्त योद्धाओं का संहार करने वाला है।[3][5]
  • समय पूरी तरह हमारे नियंत्रण से बाहर है; यह सत्य स्वीकार करना ही वैराग्य, अनासक्ति और निष्काम कर्म की गीता-सम्मत साधना को व्यावहारिक बनाता है।[3]

5. कर्म (Karma): बन्धन और मुक्ति दोनों का साधन

  • कर्म केवल क्रिया नहीं, बल्कि नैतिक परिणाम सहित वह संपूर्ण व्यवस्था है जिसके माध्यम से जीव सुख-दुःख, पाप-पुण्य और जन्म-मरण का अनुभव करता है।[6]
  • Bhagavad-gītā का कर्मयोग यह सिखाता है कि मनुष्य को अपना स्वधर्म करते हुए कर्म-फल की आसक्ति छोड़ दे; इस प्रकार वही कर्म, जो बन्धन का कारण बनते हैं, साधना और मुक्ति के साधन बन जाते हैं।[6][3]

इन पाँच विषयों से साधना का व्यावहारिक मार्ग

  • ईश्वर को सर्वोच्च स्वीकार करने से भक्ति और शरणागति का भाव विकसित होता है; जीव और प्रकृति के भेद को समझने से असली और नकली “मैं” में फर्क करना आसान होता है।[2][3]
  • काल की अपरिहार्यता और कर्म की सूक्ष्म व्यवस्था को जानकर साधक वर्तमान क्षण में अपना कर्तव्य करते हुए भी भीतर से स्वतंत्र और शांत रहना सीखता है—यही गीता का जीवन-धर्म है।[3][6]

Short note (English)

  • Many traditional commentators classify the Bhagavad-gītā’s philosophical teaching under five headings—Īśvara, Jīva, Prakṛti, Kāla and Karma—thereby outlining a complete vision of reality and liberation.[1][2]

References

  • [1] “The Five Subject Matters Covered in the Bhagavad-gita.” Official blog, accessed 18 Jan. 2026.
  • [2] “Bhagavad Gita.” Wikipedia, accessed 18 Jan. 2026, https://en.wikipedia.org/wiki/Bhagavad_Gita.
  • [3] “Bhagavad Gītā.” Internet Encyclopedia of Philosophy, accessed 18 Jan. 2026.
  • [4] “Bhagavad Gita – Overview of Chapters and Themes.” various study resources, accessed 18 Jan. 2026.
  • [5] “Bhagavad Gita: 18 Chapters, 700 Verses.” summary portal, accessed 18 Jan. 2026.
  • [6] “Karma Yoga (Bhagavad Gita).” Wikipedia, accessed 18 Jan. 2026, https://en.wikipedia.org/wiki/Karma_Yoga_(Bhagavad_Gita).

Sunday, January 18, 2026

“गीता” vs “भगवद्गीता”: व्याकरण और प्रयोग की बारीकियाँ

“गीता” vs “भगवद्गीता”: व्याकरण और प्रयोग की बारीकियाँ

अक्सर लोग “गीता पढ़ी है?” और “भगवद्गीता पढ़ी है?” को एक ही अर्थ में इस्तेमाल करते हैं, लेकिन भाषा और व्याकरण की दृष्टि से इन दोनों रूपों में कुछ रोचक अंतर छिपे हैं।[1][2]

मूल शब्द और व्युत्पत्ति

  • “भगवद्गीता” का संस्कृत रूप Bhagavad-gītā है, जो दो शब्दों से मिलकर बना है:[1]
    • bhagavat (भगवद्) = भगवान से संबंधित, ईश्वरीय, दिव्य।[1]
    • gītā (गीता) = गाया हुआ, गीत, उपदेश के रूप में व्यक्त वाणी।[1]
  • संधि के कारण “भगवद् + गीता” मिलकर एक समास रूप “भगवद्गीता” बनता है; यही ग्रंथ का मान्य मूल शीर्षक है।[1][3]

“गीता” अकेले कहने का अर्थ

  • शाब्दिक रूप से “गीता” किसी भी “गीत/उपदेश रूप में कही गई वाणी” के लिए सामान्य शब्द है।[1]
  • व्यवहार में, भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ में “गीता” कहने पर प्रायः “भगवद्गीता” ही समझी जाती है, जब तक अलग से “शिव गीता”, “अष्टावक्र गीता” आदि न कहा जाए।[1][4]

व्याकरणिक वर्ग: कौन सी संज्ञा?

  • “भगवद्गीता” एक विशिष्ट संज्ञा (proper noun) है; यह एक निश्चित ग्रंथ का नाम है, जैसे “रामायण” या “महाभारत”।[2]
  • “गीता” मूल रूप से सामान्य संज्ञा है, लेकिन सांस्कृतिक-धार्मिक प्रयोग में यह भी proper noun के रूप में काम करने लगी है, ठीक उसी तरह जैसे “कुरान”, “बाइबल” आदि।[1][2]

Grammar View: संक्षिप्त सारणी

रूप प्रकार अर्थ/सन्दर्भ उदाहरण प्रयोग
गीता सामान्य → विशिष्ट संज्ञा गीत / प्रायः भगवद्गीता “मैं रोज़ गीता के दो श्लोक पढ़ता हूँ।”[1]
भगवद्गीता विशिष्ट संज्ञा कृष्ण-अर्जुन संवाद वाला ग्रंथ “भगवद्गीता कर्मयोग का गहन विश्लेषण करती है।”[1][2]

संधि, समास और वर्तनी

  • संस्कृत की दृष्टि से शुद्ध रूप “भगवद्गीता” (एक शब्द) है; “भगवत गीता” या “भगवद् गीता” अलग-अलग लिखना शास्त्रीय वर्तनी के अनुसार कम शुद्ध माना जाता है।[1][3]
  • विस्तृत नाम “श्रीमद्भगवद्गीता” में “श्रीमद्” सम्मानसूचक विशेषण है, जो पूरे ग्रंथ के लिए आदर-सूचक उपसर्ग के रूप में जुड़ता है और समास रूप में एक इकाई बन जाता है।[1]

औपचारिक और अनौपचारिक प्रयोग

  • शास्त्रीय लेखन, शोधपत्र, किताब के शीर्षक, या औपचारिक संदर्भों में “श्रीमद्भगवद्गीता” या “भगवद्गीता” लिखना अधिक उपयुक्त माना जाता है।[1]
  • सामान्य बातचीत, प्रवचन, लोकप्रिय लेख आदि में “गीता” कहना स्वाभाविक और स्वीकार्य है, बशर्ते संदर्भ से स्पष्ट हो कि बात इसी ग्रंथ की हो रही है।[1][4]

लेखन में व्यावहारिक टिप

पहली बार उल्लेख करते समय आप इस तरह लिख सकते हैं:

यह चर्चा श्रीमद्भगवद्गीता (संक्षेप में: गीता) के व्याकरणिक और दार्शनिक पक्षों पर केंद्रित है।

इसके बाद पूरे लेख में केवल “गीता” लिखते रहें, तो पाठक के लिए भी स्पष्टता बनी रहती है और व्याकरणिक शुद्धता भी बनी रहती है।[1]

अंग्रेज़ी और हिंदी में नाम-लेखन

  • अंग्रेज़ी में मानक रूप प्रायः Bhagavad Gita या अधिक शुद्ध रूप में Bhagavad-gītā लिखा जाता है; शब्द-प्रकार के रूप में इसे noun (proper) माना जाता है।[1][2]
  • हिंदी में देवनागरी में “भगवद्गीता” तथा आदरसूचक पूर्ण रूप में “श्रीमद्भगवद्गीता” लिखना मानक है; “गीता” लोकप्रिय संक्षिप्त रूप है।[1]

निष्कर्ष: कहाँ कौन-सा रूप बेहतर?

  • जब आप भाषा, दर्शन, या शास्त्र पर औपचारिक लेखन कर रहे हों, तो शीर्षक और पहली बार संदर्भ में “भगवद्गीता” या “श्रीमद्भगवद्गीता” लिखें।[1]
  • जब आप सार्वजनिक संवाद को सहज बनाना चाहते हों—ब्लॉग, व्याख्यान या सोशल मीडिया पोस्ट में—तो “गीता” का प्रयोग भी ठीक है, पर पहली बार पूरा नाम अवश्य स्पष्ट कर दें।[1][2]

Short notes (English)

  • The term Bhagavad Gītā functions as a proper noun in both Sanskrit and English, denoting a specific scriptural text within the Mahābhārata tradition.[1][2]
  • In modern Hindi usage, the shorter form Gītā has undergone semantic narrowing, so that it typically refers to the Bhagavad Gītā unless the context explicitly indicates another “Gītā” text.[1][4]
  • From a grammatical perspective, Bhagavad Gītā is a compound expression derived from bhagavat (“divine, pertaining to God”) and gītā (“sung, chanted discourse”), forming a unified title in classical Sanskrit orthography.[1][3]

References

  • [1] “Bhagavad Gita.” Wikipedia, accessed 18 Jan. 2026, https://en.wikipedia.org/wiki/Bhagavad_Gita.[web:2]
  • [2] “Bhagavad-gītā.” WordType.org, accessed 18 Jan. 2026, https://wordtype.org/of/bhagavad-g%C4%ABt%C4%81.[web:20]
  • [3] Bhagavad Gita Grammar. Three volumes, archive text, accessed 18 Jan. 2026.[web:17]
  • [4] “What is the difference between Geeta and Bhagavad Gita?” video and discussion, accessed 18 Jan. 2026.[web:12]

Sunday, November 2, 2025

CH18-01 | अर्जुन का प्रश्न: संन्यास और त्याग का सार – गीता, अध्याय १८, श्लोक १

परिचय

श्रीमद्भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय का पहला श्लोक योग और जीवन की जटिलता को स्पष्ट रूप से सामने लाता है। अर्जुन, जो युद्धभूमि में अपने मार्गदर्शक श्रीकृष्ण से मार्गदर्शन प्राप्त कर रहे हैं, एक अत्यंत गूढ़ प्रश्न पूछते हैं — संन्यास और त्याग का वास्तविक तत्त्व क्या है? दोनों में क्या अंतर है? उनका अंतिम उद्देश्य आत्मज्ञान और कर्म की सही समझ है।

श्लोक

अर्जुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥१८- १॥

हिन्दी भावार्थ:

अर्जुन बोले: हे महाबाहु श्रीकृष्ण, मैं संन्यास (कर्मों के पूर्ण त्याग) और त्याग (कर्म के फल की इच्छा के त्याग) का वास्तविक तत्त्व जानना चाहता हूँ। हे हृषीकेश, हे केशिनिषूदन! कृपया इन दोनों का भेद भी पृथक-पृथक करके बताइये।

समस्या की पृष्ठभूमि

अर्जुन के इस प्रश्न का महत्व उसके गहरे अंतर्द्वंद्व में छुपा है। जीवन और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए मनुष्य को अक्सर यह समझ नहीं आती कि क्या सभी कर्म छोड़ देना ही मोक्ष का मार्ग है या अपनी जिम्मेदारियों का पालन करते हुए फल की आसक्ति छोड़ देना ही सार्थक है। गीता का यह श्लोक उसी द्वंद्व का दर्पण है।

संन्यास बनाम त्याग

संन्यासत्याग
कर्म का परित्यागकर्म का फल छोड़ना
जीवन की सभी जिम्मेदारियों से विमुखताकर्तव्य का पालन, बिना फल की इच्छा के
साधना की धारा में कर्म-शून्यतासाधना में फल-सून्यता

 श्रीकृष्ण आगे उत्तर देते हैं कि केवल बाह्य कर्मों का त्याग (संन्यास) से पूर्ण मुक्ति संभव नहीं। सही त्याग वह है, जिसमें व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों का पालन करता है, लेकिन फल की आसक्ति से मुक्त रहता है।

जीवन में प्रासंगिकता

आज के समय, जब लोग तनाव मुक्त जीवन की चाह रखते हैं, यह श्लोक गहरा बोध देता है: जीवन में कर्म करना अनिवार्य है, लेकिन उससे जुड़ी अपेक्षाएं, चिंता और आसक्ति छोड़ना ही सच्चा त्याग है। यही मानसिक शांति और संतुलन का मार्ग है।

निष्कर्ष

अर्जुन का प्रश्न हर जिज्ञासु मन का प्रश्न है। गीता की शिक्षाएँ हमें कर्म का महत्व सिखाती हैं, लेकिन उससे भी अधिक, अपने भीतर के त्याग का महत्व समझाती हैं। तभी वास्तविक मोक्ष और संतुलन संभव है।

श्लोक और अर्थ:

अर्जुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥१८- १॥


अर्थ: अर्जुन ने कहा – हे महाबाहु श्रीकृष्ण! मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को और उनका परस्पर भेद पृथक-पृथक जानना चाहता हूँ।

आपके विचार:
क्या आप भी जीवन में कभी ऐसे द्वंद्व से गुजरे हैं? संन्यास और त्याग के बीच आपके लिए क्या सही मार्ग है? नीचे कमेंट में साझा करें।

Sunday, October 22, 2023

भगवान श्री कृष्ण का मंत्र

 वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

कंस और चाणूर का वध करनेवाले, देवकी के आनन्दवर्द्धन, वसुदेवनन्दन जगद्गुरु श्रीक़ृष्ण चन्द्र की मैं वन्दना करता हूँ ।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

यह मंत्र भगवान विष्णु और श्री कृष्ण का मंत्र है।

ओम नामे भगवते वासुदेवया यह एक प्रसिद्ध हिन्दू मंत्र है। यह मंत्र भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण दोनों का मंत्र है। इसमें दो परंपराएं हैं-तांत्रिक और पुराणिक। तांत्रिक पंरपराये में ऋषि प्रजापति आते है और पुराणिक पंरपरा में ऋषि नारदा जी आते है। हालांकि, दोनों कहते हैं कि यह सर्वोच्च विष्णु मंत्र है। शारदा तिलक तन्त्रम कहते है कि ‘देवदर्शन महामंत्र् प्राधन वैष्णवगाम’ बारह वैष्णव मंत्रों में यह मत्रं प्रमुख हैं। इसी प्रकार ‘श्रीमद् भगवतम्’ के 12 अध्याय को इस मंत्र के 12 अक्षर के विस्तार के रूप में लिए गए है। इस मंत्र को मुक्ति का मंत्र कहा जाता है और मोक्ष प्राप्त करने के लिए एक आध्यात्मिक सूत्र के रूप में माना जाता है। यह मंत्र ‘श्रीमद् भगवतम्’ का प्रमुख मंत्र है इस मंत्र का वर्णन विष्णु पुराण में भी मिलता है।


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः


मंत्र का अर्थ:

ओम - ओम यह ब्रंह्माडीय व लौकीक ध्वनि है।

नमो - अभिवादन व नमस्कार।

भगवते - शक्तिशाली, दयालु व जो दिव्य है।

वासुदेवयः - वासु का अर्थ हैः सभी प्राणियों में जीवन और देवयः का अर्थ हैः ईश्वर। इसका मतलब है कि भगवान (जीवन/प्रकाश) जो सभी प्राणियों का जीवन है।


वासुदेव भगवान! अर्थात् जो वासुदेव भगवान नर में से नारायण बने, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ। जब नारायण हो जाते हैं, तब वासुदेव कहलाते हैं।

आदि शंकराचार्य द्वारा लिखित "भज गोविंदम"

भज गोविंदम भज गोविंदम
गोविंदम भज मूढ़-मते |
संप्राप्ते सन्निहिते काले
नहि न रक्षति शुक्रकारणे ||


ॐ श्री कृष्णः शरणम् ममः

ॐ श्री कृष्णः शरणम् ममः


ॐ श्याम वासुदेवाय नमः


ॐ श्याम वासुदेवाय नमः

ॐ श्रीं नम: श्रीकृष्णाय मधुरतमाय स्वाहा," भगवान कृष्ण की दिव्य उपस्थिति और प्रचुरता का एक शक्तिशाली आह्वान है। 
"ॐ श्रीं नम: श्रीकृष्णाय स्तुत्यमय स्वाहा" 
ॐ श्रीं नम: श्रीकृष्ण परिपूर्णतमाय स्वाहा 
ॐ क्लीं कृष्णाय गोविंदाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा


ये छंद भगवान कृष्ण की प्रशंसा में हैं, विशेषकर उनके दिव्य रूप और उनके जन्म के दृश्य की।

ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।।

शङ्खचक्रगदापद्मं धारयन्तं जनार्दनम् ।
अङ्के शयानं देवक्याः सूतिकामन्दिरे शुभे ।।
एवं रूपं सदा कृष्ण सुतार्थं भावयेत् सुधीः ।।

शङ्खचक्रगदापद्मं दधानं सूतिकागृहे ।
अङ्के शयानं देवक्याः कृष्णं वन्दे विमुक्तये ।।

॥ देवकी सूत गोविंद वासुदेव जगतपते देहिमे तनय कृष्ण त्वाहम शरणगते ॥





Monday, October 16, 2023

Arjun ke Solah Prashan| अर्जुन के सोलह प्रश्न

महाभारत के भीष्म पर्व (जिसमें भगवद्गीता सम्मिलित है) के प्रारम्भ में युद्धभूमि पर अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से जीवन, धर्म, कर्तव्य, और युद्ध को लेकर कई गहन प्रश्न पूछे थे, जिनकी संख्या 16 मानी जाती है, लेकिन प्रामाणिक महाभारत या गीता में इन प्रश्नों की गिनती या स्पष्ट सूची सामान्यतः नहीं मिलती। 

क्रमप्रश्न का सारअध्याय और श्लोक
1स्थिरप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण क्या हैं?अध्याय 2, श्लोक 54
2ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है तो युद्ध क्यों करूं?अध्याय 3, श्लोक 1
3मनुष्य को पाप कर्म के लिए कौन प्रेरित करता है?अध्याय 3, श्लोक 36
4आप विवस्वान के बाद जन्मे फिर उन्हें कैसे गीता का ज्ञान दिया?अध्याय 4, श्लोक 4
5त्याग और कर्म योग में श्रेष्ठ कौन?अध्याय 5, श्लोक 1
6मन को नियंत्रित करना कठिन क्यों है?अध्याय 6, श्लोक 34
7योग का मार्ग बीच में छोड़ने वाले का क्या होता है?अध्याय 6, श्लोक 37
8ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ क्या हैं?अध्याय 8, श्लोक 1-2
9आपके ऐश्वर्य का विस्तार बताइएअध्याय 10, श्लोक 16
10आपका विराट रूप दिखाइएअध्याय 11, श्लोक 3
11आप कौन हैं, आपके वास्तविक स्वरूप क्या है?अध्याय 11, श्लोक 31
12साकार और निराकार उपासक में श्रेष्ठ कौन है?अध्याय 12, श्लोक 1
13क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, प्रकृति और पुरुष क्या हैं?अध्याय 13, श्लोक 1
14तीन गुण से परे व्यक्ति के लक्षण क्या हैं?अध्याय 14, श्लोक 21
15श्रद्धा के तीन प्रकार का विवेचनअध्याय 17, श्लोक 1
16संन्यास और त्याग में अंतर क्या है?अध्याय 18, श्लोक 1


1. स्थिरप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण (अध्याय 2, श्लोक 54)  
अर्जुन उवाच - स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥

2. ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ, फिर युद्ध क्यों? (अध्याय 3, श्लोक 1)  
अर्जुन उवाच - ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥

3. पाप कर्म के लिए प्रेरणा क्यों? (अध्याय 3, श्लोक 36)  
अर्जुन उवाच - अथ केन प्रयुक्तो ’यं पापं चरति पूरुषः। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥

4. विवस्वान के बाद ज्ञान कैसे दिया? (अध्याय 4, श्लोक 4)  
अर्जुन उवाच - अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥

5. त्याग और कर्म योग में श्रेष्ठ कौन? (अध्याय 5, श्लोक 1)  
अर्जुन उवाच - संन्यासं कर्मयोगं च नि:श्रेयसमिति श्रुतः। तयोः यत्कर्म यत: कार्यं क्रियाविशेषमाह तदा॥

6. मन नियंत्रित करना कठिन क्यों? (अध्याय 6, श्लोक 34)  
अर्जुन उवाच - चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥

7. योग का मार्ग छोड़ने का परिणाम? (अध्याय 6, श्लोक 37)  
अर्जुन उवाच - अयतिः श्रद्धयोपेतः योगाच्चलितमानसः। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥

8. ब्रह्म, अधिभूत आदि क्या हैं? (अध्याय 8, श्लोक 1-2)  
अर्जुन उवाच - किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥  
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन। प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥

9. आपके ऐश्वर्य का विस्तार बताइए (अध्याय 10, श्लोक 16)  
अर्जुन उवाच - विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन। भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥

10. आपका विराट रूप दिखाइए (अध्याय 11, श्लोक 3)  
अर्जुन उवाच - अनेकवक्त्रनयनं अनेकदंष्ट्रितोर्ध्व नीतरुचि। अनेकसर्पोद्भूतं मुखमव्यक्तमिदं वृणु।

11. आप कौन हैं? वास्तविक स्वरूप क्या? (अध्याय 11, श्लोक 31)  
अर्जुन उवाच - किमेतद् व्याप्यस्त्वमस्य विश्वमनन्तरूप। इदं त्वं जगदेकं नानावद्भिः पोषितमन्नम्॥

12. साकार और निराकार उपासक में श्रेष्ठ कौन? (अध्याय 12, श्लोक 1)  
अर्जुन उवाच - एवं सततयुक्ता ye भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमा:।

13. क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, प्रकृति, पुरुष क्या? (अध्याय 13, श्लोक 1)  
अर्जुन उवाच - प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च। एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥

14. तीन गुण से परे व्यक्ति के लक्षण? (अध्याय 14, श्लोक 21)  
अर्जुन उवाच - कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो। किमाचारः कथं चेतां स्त्रीन्गुणानतिवर्तते॥

15. श्रद्धा के तीन प्रकार? (अध्याय 17, श्लोक 1)  
अर्जुन उवाच - ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥

16. संन्यास और त्याग में अंतर? (अध्याय 18, श्लोक 1)  
अर्जुन उवाच - संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्। त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥


गीता पर भाष्य


संस्कृत साहित्य की परम्परा में उन ग्रन्थों को भाष्य (शाब्दिक अर्थ - व्याख्या के योग्य), कहते हैं जो दूसरे ग्रन्थों के अर्थ की वृहद व्याख्या या टीका प्रस्तुत करते हैं। भारतीय दार्शनिक परंपरा में किसी भी नये दर्शन को या किसी दर्शन के नये स्वरूप को जड़ जमाने के लिए जिन तीन ग्रन्थों पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना पड़ता था (अर्थात् भाष्य लिखकर) उनमें भगवद्गीता भी एक है (अन्य दो हैं- उपनिषद् तथा ब्रह्मसूत्र)। [4]


गीता पर अनेक अचार्यों एवं विद्वानों ने टीकाएँ की हैं। संप्रदायों के अनुसार उनकी संक्षिप्त सूची इस प्रकार है :


(अ) अद्वैत - शांकराभाष्य, श्रीधरकृत सुबोधिनी, मधुसूदन सरस्वतीकृत गूढ़ार्थदीपिका।

(आ) विशिष्टाद्वैत -

(१) यामुनाचार्य कृत गीता अर्थसंग्रह, जिसपर वेदांतदेशिककृत गीतार्थ-संग्रह रक्षा टीका है।

(२) रामानुजाचार्यकृत गीताभाष्य, जिसपर वेदांतदेशिककृत तात्पर्यचंद्रिका टीका है।

(इ) द्वैत - मध्वाचार्य कृत गीताभाष्य, जिसपर जयतीर्थकृत प्रमेयदीपिका टीका है, मध्वाचार्यकृत गीता-तात्पर्य निर्णय।

(ई) शुद्धाद्वैत - वल्लभाचार्य कृत तत्वदीपिका, जिसपर पुरुषोत्तमकृत अमृततरंगिणी टीका है।

(उ) कश्मीरी टीकाएँ - १. अभिनवगुप्तकृत गीतार्थ संग्रह। २. आनंदवर्धनकृत ज्ञानकर्मसमुच्चय।

इनके अतिरिक्त महाराष्ट्र संत ज्ञानदेव या ज्ञानेश्वरकृत भावार्थदीपिका नाम की टीका (१२९०) प्रसिद्ध है जो गीता के ज्ञान को भावात्मक काव्यशैली में प्रकट करती है। महाराष्ट्र मे महानुभाव संप्रदाय के संस्थापक चक्रधर स्वामी इनके महानुभाव तत्वज्ञान पर आधारित मुरलीधर शास्त्री आराध्ये इन्होने रहस्यार्थ चंद्रिका नाम की गीता टीका लिखी है। इसके सीवा महानुभाव संप्रदाय मे और भी 52 गीता टीका उपलब्ध है। वर्तमान युग में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलककृत गीतारहस्य टीका, जो अत्यंत विस्तृत भूमिका तथा विवेचन के साथ पहली बार १९१५ ई। में पूना से प्रकाशित हुई थी, गीता साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। उसने गीता के मूल अर्थों को विद्वानों तक पहुँचाने में ऐसा मोड़ दिया है जो शंकराचार्य के बाद आज तक संभव नहीं हुआ था। वस्तुत: शंकराचार्य का भाष्य गीता का मुख्य अर्थ ज्ञानपरक करता है जबकि तिलक ने गीता को कर्म का प्रतिपादक शस्त्र सिद्ध किया है।


गीताभाष्य - आदि शंकराचार्य

गीताभाष्य - रामानुज

गूढार्थदीपिका टीका - मधुसूदन सरस्वती

सुबोधिनी टीका - श्रीधर स्वामी

ज्ञानेश्वरी - संत ज्ञानेश्वर (संस्कृत से गीता का मराठी अनुवाद)

गीतारहस्य - बालगंगाधर तिलक

अनासक्ति योग - महात्मा गांधी

Essays on Gita - अरविन्द घोष

ईश्वरार्जुन संवाद- परमहंस योगानन्द

गीता-प्रवचन - विनोबा भावे

गीता तत्व विवेचनी टीका - जयदयाल गोयन्दका

भगवदगीता का सार- स्वामी क्रियानन्द

गीता साधक संजीवनी (टीका)- स्वामी रामसुखदास

गीता हृदय-यति राज दण्डी स्वामी सहजानंद सरस्वती

श्रीमद्भगवद्गीता (आध्यात्मिक गीता के नाम से प्रसिद्ध) - योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी व श्री भूपेद्रनाथ सान्याल जी की टीका और गोपीनाथ कविराज जी द्वारा भूमिका [5]

भगवद्गीता पर उपलब्ध सभी भाष्यों में श्री जयदयाल गोयन्दका की तत्व विवेचनी सर्वाधिक लोकप्रिय तथा जनसुलभ है। इसका प्रकाशन गीताप्रेस के द्वारा किया जाता है। आजतक इसकी 10 करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं।

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