CH-15 | अध्यायः १५ पुरुषोत्तमयोगः
अध्यायः १५ पुरुषोत्तमयोगः भगवद् गीता का अध्याय १५ "पुरुषोत्तमयोग" के नाम से जाना जाता है। इस अध्याय में भगवान कृष्ण परमात्मा के रूप, महत्त्व और अधिकार के बारे में बताते हुए उनसे सम्बंधित ज्ञान को समझाते हैं। भगवान कृष्ण यहां बताते हैं कि संसार के समस्त प्राणियों का मूल रूप परमात्मा ही होता है और उन्हें जानना चाहिए कि परमात्मा सबके अंतर्यामी होते हुए उनसे भिन्न और अभिन्न दो रूपों में प्रकट होते हैं। वह संसार में विभिन्न रूपों में प्रकट होता है, परन्तु वह इन सबके अतिरिक्त एकमात्र अविनाशी आत्मा ही होता है। इस अध्याय में भगवान कृष्ण ने संसार के चक्र के बारे में भी बताया है। उन्होंने बताया कि जीवात्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से प्रभावित होता है और इस चक्र से मुक्त होकर वह परमात्मा के साथ एकीकृत हो जाता है। इस अध्याय में भगवान कृष्ण ने भक्ति के महत्व को बताते हुए कहा है कि जो भक्त उनके साथ भगवद् भाव में लगे रहते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति सुनिश्चित है। भगवान ने यह भी बताया कि वही जीव संसार में दुखों से मुक्त हो सकता है, जो उनकी शरण में आता है और उनका सेवन करता है। वह भगवान का भक्त...